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Blog image DR. RAJESH KUMAR SINGH Shared publicly - May 10 2021 7:53PM

BA SEMESTER 5 C11 FRENCH REVOLUTION CAUSES


फ्रांस की राजक्रान्ति के कारण
 
फ्रांस की राजक्रान्ति न केवल यूरोप के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थीं अपितु सम्पूर्ण विश्व के इतिहास की एक अद्भुत घटना स्वीकार की जाती है। निस्सन्देह फ्रांस की राजक्रान्ति के विस्फोट से पूर्व वहाँ की राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक दशा अत्यन्त दयनीय थी किन्तु क्रान्ति किसी एक घटना का परिणाम नहीं होती और न ही अनेक महत्वहीन घटनाएँ मिलकर क्रान्ति के विस्फोट में सहायक हो सकती हैं। वस्तुतः प्रत्येक क्रान्ति के प्रस्फुटन में कुछ महत्वपूर्ण कारणों का सामूहिक योगदान होता है। क्रान्ति के कारणों की बारूद में अग्नि धीरे-धीरे प्रज्वलित होती है और अन्त में उसमें विस्फोट हो जाता है। एक प्रसिद्ध विद्वान ने इस सन्दर्भ में लिखा है- “बौद्धिक जागरण एवं भौतिक असन्तोष के मिश्रण के परिणामस्वरूप फ्रांस की राजक्रान्ति का प्रस्फुटन हुआ। वस्तुतः बौद्धिक जागरण के कारण ही भौतिक असन्तोष विकृत रूप से सामने आया था।" वास्तव में, फ्रांस की राजक्रान्ति के विस्फोट के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे
 
राजनीतिक कारण
 
1. राजाओं की निरंकुशता- फ्रांस की राजक्रान्ति के विस्फोट के अवसर पर फ्रांस में निरंकुश शासन पद्धति का प्रचलन था। राजा स्वयं को पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि मानते थे और निरंकुश स्वेच्छाचारी तरीके से अबाध रूप से जनता पर शासन करते थे। राजा की इच्छा ही कानून होती थी।न्यायिक जांच की आवश्यकता नहीं होती थी। राजाओं और सामन्तों की स्वेच्छाचारिता के कारण मुद्रित पत्रों के द्वारा वाल्टेयर और मिराब्यू जैसे महान व्यक्तियों को भी बन्दीगृह भेजा गया था। अपनी तानाशाही प्रवृत्ति के कारण ही फ्रांस के राजाओं ने पिछले 175 वर्षों से एस्टेट जनरल का कोई अधिवेशन नहीं बुलाया था। राज्य के अन्तर्गत होने वाली समस्त नियुक्तियाँ राजा के ही द्वारा की जाती थीं और वह उन्हें पदच्युत करने का अधिकार रखता था। राज्य में कोई नीति निर्धारित करने के निश्चित सिद्धान्त नहीं थे। चारों ओर असन्तोष एवं भ्रष्टाचार का बोलबाला था। बूब शासक प्रशासन व्यवस्था पर नियन्त्रण बनाये रखने मे पूरी तरह असफल हो रहे थे, परिणामतः धीरे-धीरे जनता का राजा में विश्वास व आदर समाप्त होता जा रहा था। और वह निरंकुश स्वेच्छाचारी शासन-व्यवस्था के जुए को उतार फेंकना चाहती थी।
 
2. दूषित प्रशासन फ्रांस की प्रशासनिक व्यवस्था का संचालन दोषपूर्ण था। उसमें भाई-भतीजावाद और पक्षपात का बोलबाला था। राज्य के समस्त महत्वपूर्ण पदों पर सामन्तों और अमीरों को ही नियुक्त किया जाता था, भले ही वह उस पद के अनुरूप योग्यता रखते हों अथवा नहीं। अनेक महत्वपूर्ण पदों को ठेके पर दिये जाने की पद्धति भी प्रचलित थी और सर्वाधिक ऊँची बोली लगाने वाले को ही उस पद पर नियुक्त किया जाता था। दिखावे के लिए प्रान्तों में गवर्नर नियुक्त किये जाते थे किन्तु इनके अधिकार नगण्य होते थे। इसी प्रकार नगरपालिकाओं एवं कॉरपोरेशनों के अधिकार भी अलग-अलग थे। विभिन्न कानूनों का प्रचलन अलग-अलग प्रान्तों में था जिसके कारण एक प्रान्त में जो कार्य नियमानुकूल और कानूनी होता था, दूसरे प्रान्त में वह गैर-कानूनी समझा जाता था जिसके कारण जनसाधारण को अनजाने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। चतुर एवं कानून-विरोधी कार्य करने वाले व्यक्ति उसका लाभ उठाते थे। प्रसिद्ध लेखक हेजन ने भी इस सन्दर्भ में लिखा है, "एक नगर में जो नियमानुकूल था, वह उससे पाँच मील की दूरी पर गैर-कानूनी था। लगभग 400 प्रकार के कानून यूरोप के विभिन्न भागों में प्रचलित थे। *"
 
3. अकुशल प्रशासनिक व्यवस्था लुई 14वें के शासनकाल में फ्रांस सम्पूर्ण यूरोप में अपनी कुशल प्रशासनिक व्यवस्था के लिए प्रख्यात था, किन्तु उसकी मृत्यु के बाद कोई भी कुशल एवं योग्य व्यक्ति फ्रांस की गद्दी पर नहीं बैठा। लुई 15वाँ अत्यन्त खर्चीला एवं मूर्ख था। उसने फ्रांस के शाही कोष का अत्यधिक दुरुपयोग किया। लुई 15वें के मूर्खतापूर्ण कार्यों एवं नीतियों के कारण कई अमेरिकी एवं भारतीय उपनिवेश फ्रांस के हाथ से निकल गये। यद्यपि मृत्यु शैय्या पर लेटे हुए लुई 14वें ने अपने पुत्र लुई 15वें को युद्ध न करने का स्पष्ट निर्देश दिया था किन्तु सप्तवर्षीय युद्ध में भाग लेकर लुई 15वें ने केवल अपने पिता की अवज्ञा ही नहीं की अपितु फ्रांस के जर्जर हो रहे आर्थिक ढाँचे पर भी घातक प्रभाव डाला। इस युद्ध ने शाही-खजाने को रिक्त करने के साथ-साथ फ्रांस के मान और सम्मान पर भी विपरीत प्रभाव डाला। इस प्रकार बूर्वो शासकों की अविवेकपूर्ण नीति एवं अकुशल शासन-व्यवस्था ने क्रान्ति को अवश्यम्भावी बना दिया।[7:51 pm, 10/05/2021] Golu Airtel: राजाओं की अयोग्यता लुई 16वें के शासनकाल तक आते-आते फ्रांस में राजतन्त्रात्मक व्यवस्था पूरी तरह से अनैतिक एवं भ्रष्ट हो चुकी थी। देश में सर्वत्र भ्रष्टाचार और असन्तोष व्याप्त था। जनसाधारण राजा के अनुत्तरदायी भ्रष्ट कार्यों के कारण उससे ऊब चुका था। इस सन्दर्भ में प्रसिद्ध लेखक रॉबर्टसन का मत है कि “लुई 16वें में अब तक मुकुट धारण करने वाले लोगों की तुलना में राजत्व के गुणों का नितान्त अभाव था। वह एक सुस्त, आलसी, निद्राप्रिय और आत्मसन्तुष्ट जीव था जो केवल शिकार, बन्दूक चलाने, बाल सँवारने और नाट्यशालाओं में रुचि रखता था। "" फ्रांस के राजा लुई 16वें पर अपनी पत्नी मेरी अन्तायनेत का बहुत बड़ा प्रभाव था जो स्वयं भी अत्यन्त खर्चीली महिला थी और जिसे अपने देश फ्रांस से कोई लगाव नहीं था। राजा अपनी सुन्दरता की प्रतिमूर्ति पत्नी के हाथ में कठपुतली के समान था। पत्नी के दूषित प्रभाव के कारण लुई 16वाँ प्रशासनिक व्यवस्था में किसी प्रकार का कोई सुधार नहीं कर सका। फलतः क्रान्ति की ज्वाला निरन्तर फ्रांसीसी समाज व देश में सुलगती रही। यदि लुई 16वें ने अपनी बुद्धि का उचित उपयोग किया होता तब वह कम से कम क्रान्ति की धारा को मोड़कर उसके वेग को कम कर सकता था। तत्कालीन राजनीतिक स्थिति पर टिप्पणी करते हुए मैडलिन ने लिखा है, “बुरी व्यवस्था का तो कोई प्रश्न नहीं, कोई व्यवस्था ही नहीं थी।" एक प्रसिद्ध विद्वान एल्टन ने भी लुई 16वें की शासन व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए लिखा है- “फ्रांस की राजक्रान्ति मुख्यतः अव्यवस्था के विरुद्ध व्यवस्था के लिए एक आन्दोलन था। 3
[7:51 pm, 10/05/2021] Golu Airtel: सामाजिक कारण
 
क्रान्ति के विस्फोट में सामाजिक कारणों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। समाज में प्रचलित असमानता ने असन्तोष को जन्म दिया और जनसाधारण को प्रेरित किया कि वे वर्तमान सामाजिक ढाँचे के विरुद्ध आवाज उठायें। मुख्य रूप से फ्रांसीसी समाज दो भागों मेंबँटा हुआ था—(i) विशेषाधिकारयुक्त वर्ग, तथा (ii) विशेषाधिकारहीन वर्ग प्रथम वर्ग में सामन्त, अमीर और उच्च पादरी वर्ग के लोग आते थे और द्वितीय वर्ग किसानों, मजदूरों, दुकानदारों, शिल्पियों और किरायेदारों के द्वारा बना हुआ था। द्वितीय वर्ग के लोगों को कोई विशेषाधिकार प्राप्त नहीं था और वे करों के भार से दबे हुए थे। अतः इस सामाजिक असमानता ने दोनों वर्गों के बीच एक ऐसी दरार उत्पन्न कर दी थी जिसे कभी भी पाटा नहीं जा सकता था।
 
विशेषाधिकारयुक्त वर्ग इस वर्ग में सामन्त, अमीर, जमींदार और बड़े पादरी आते थे जो फ्रांस की सम्पूर्ण जनसंख्या का केवल एक प्रतिशत भाग थे, फिर भी वे अनेक सुविधाओं और विशेषाधिकारों से परिपूर्ण थे। राज्य के समस्त महत्वपूर्ण पदों पर उनका एकाधिकार था। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत एस्टेट, तन्दूर, शराबखाने व आटे की चक्कियाँ लगा रखी थीं और जो जनसाधारण के लोग इनके क्षेत्रों में निवास करते थे उन्हें इन्हीं के द्वारा स्थापित संस्थानों से कार्य कराना पड़ता था। साथ ही ये लोग जनसाधारण से अनेक प्रकार के कर भी वसूल करते थे, जबकि ये स्वयं करों से पूर्णतया मुक्त थे। इनके पालतू पशु किसी भी किसान के खेत में घुसकर उसकी खेती को उजाड़ सकते थे और उस गरीब किसान को यह अधिकार नहीं था कि वह उन जानवरों को अपने खेत से बाहर निकाल सके। विशेषाधिकारयुक्त वर्ग के द्वारा किये गये अत्याचारों और शोषणों के कारण ही किसानों के हृदय में उनके प्रति घृणा और द्वेष की भावना का उदय हो गया था और वह इनके बन्धन से मुक्त होने की कामना करने लगे थे।
 
प्रशासन के महत्वपूर्ण पदों पर एकाधिकार के साथ, इस विशेषाधिकार वर्ग के नौजवान पुत्रों को चर्च से सम्बन्धित महत्वपूर्ण पदों पर भी नियुक्त किया जाता था। इस पर शायद किसी भी व्यक्ति को कोई आपत्ति न होती यदि इन पदों पर नियुक्त किये जाने वाले इन लोगों में आवश्यक योग्यता होती। परन्तु इनकी अयोग्यता और अक्षमता के बाद भी चर्च के महत्वपूर्ण पदों को इन्हें दिये जाने के कारण जनसाधारण दुःखी था। विशेषाधिकारों से युक्त ये नौजवान चर्च के धन को निरन्तर अपने आनन्द और विलास पर खर्च कर रहे थे। इन्हें चर्च के धार्मिक उत्सवों में कोई रुचि नहीं थी और वे निरन्तर राजदरबार के षड्यन्त्रों में भाग लेकर अपना समय नष्ट कर रहे थे। पवित्रता, शुद्धता और धार्मिक चिन्तन उन्हें छू तक नहीं गया था। हेजन ने भी लिखा है- “समस्त महत्वपूर्ण एवं लाभदायक पदों पर सामन्तों के पुत्रों का
 
एकाधिकार था. इनमें से अनेक दरबार में रहते थे और प्रसन्नतापूर्ण सांसारिक जीवन व्यतीत करते थे। "" पादरियों में छोटे पादरी अपनी स्थिति से सन्तुष्ट नहीं थे। वे समस्त धार्मिक कर्तव्यों का निर्वाह करते थे, किन्तु उनकी आय अत्यन्त कम थी। इसलिए वे उन बड़े पादरियों से घृणा करते थे जिनके पास अपार सम्पत्ति थी, जो धार्मिक कर्तव्यों का निर्वाह नहीं करते और अत्यन्त आराम और विलास का जीवन व्यतीत करते थे। छोटे पादरियों का दृष्टिकोण शोषित किसानों और मजदूरों के प्रति उदार था जिन पर सामन्तगण व बड़े पादरी तरह-तरह के अत्याचार करते थे। इसीलिए शीघ्र छोटे पादरियों ने जनसाधारण वर्ग के साथ सहयोग करना प्रारम्भ कर दिया था, क्योंकि दोनों वर्ग विशेषाधिकारयुक्त वर्ग की अतिवादी नीतियों से पीड़ित थे। पादरियों के सम्बन्ध में यह भी उल्लेखनीय है कि वे सुशिक्षित थे और तत्कालीन सुधारवादी
 
1 "These highly lucrative positions were monopolized by the younger son nobility....many of whom, indeed, resided at court at lived the gay and worldly life." -C. D. Hazenआन्दोलनों के प्रति पूरी तरह जागरूक थे। क्रान्तिकारी साहित्य से अवगत होने के कारण उनका झुकाव जनतन्त्रवादी प्रवृत्ति की ओर हो गया था। फ्रांस में जब क्रान्ति प्रारम्भ हुई तो उस समय इन्होंने क्रान्ति के अमदूत का कार्य किया। अतः क्रान्ति का समर्थन करके उसको सफल बनाने में छोटे पादरियों ने एक अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका अभिनीत की थी। विशेषाधिकारहीन वर्ग - विशेषाधिकारहीन वर्ग स्वयं दो भागों में विभाजित था। इसमें
 
एक मध्यम वर्ग था और दूसरा जनसाधारण मध्यम वर्ग धन-सम्पन्न था और उसमें शिक्षित लोग थे किन्तु जनसाधारण की स्थिति अत्यन्त शोचनीय थी।
 
(i) मध्यम वर्ग इस वर्ग में मुख्यतः डॉक्टर्स, वकील, दार्शनिक और प्रोफेसर लोग आते थे जिनके पास शिक्षा, धन व बुद्धि का अद्भुत समन्वय था। इन्होंने व्यापार एवं बौद्धिक क्षेत्र में अपना एकाधिकार स्थापित कर लिया था। अक्सर ये सामन्तों को धन उधार दिया करते थे। भी आवश्यकता पड़ने पर समय-समय पर इनसे ऋण लिया करती थी। परन्तु इन्हें किसी प्रकार का कोई विशेषाधिकार प्राप्त नहीं था। इसलिए ये अपनी स्थिति से सन्तुष्ट नहीं थे। सम्पन्न और सुयोग्य होते हुए भी ये सामन्तों और कुलीनों के समान सामाजिक सम्मान से वंचित थे, अतः वर्तमान व्यवस्था के विरोधी थे।
 
उनका विरोध अत्यन्त स्वाभाविक था क्योंकि उनकी यह धारणा थी कि वे धनी हैं, योग्य हैं और सभ्य हैं, परन्तु फिर भी समाज में उन्हें कोई महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त नहीं है जबकि उनकी तुलना में कम बुद्धिमान और कुछ निकम्मे कुलीन अनेकानेक विशेषाधिकारों से युक्त हैं। साथ ही कुलीनों का मध्यम वर्ग के लोगों के प्रति व्यवहार अत्यन्त बुरा था और वे निरन्तर उन्हें अपमानित करने के अवसर की ताक में रहते थे। इसलिए वे विशेषाधिकार वर्ग का विरोध हुए 'स्वतन्त्रता' के स्थान पर 'समानता' पर अधिक बल देते थे। फ्रांस की उत्तरोत्तर बिगड़ती हुई आर्थिक स्थिति भी मध्यम वर्ग के असन्तोष का बहुत बड़ा कारण थी। इससे उनके व्यवसाय और उद्योग-धन्धों पर विपरीत प्रभाव पड़ता था, इसलिए वह तत्कालीन पुरातन व्यवस्था के अन्त में रुचि रखते थे और उन्होंने ही जनसाधारण में जागृति उत्पन्न करके उन्हें अपनी हेय स्थिति का ज्ञान कराया था।
 
(ii) जनसाधारण वर्ग - फ्रांसीसी समाज में सबसे अधिक गिरी हुई स्थिति जनसाधारण की थी जिसे तृतीय एस्टेट (Third Estate) कहा जाता था। इस वर्ग में कृषक, मजदूर, घरेलू मजदूर आदि लोग आते थे। समाज में इस वर्ग की संख्या बहुत अधिक थी, फिर भी इनके जीवन में इतना शोषण व उत्पीड़न जुड़ा हुआ था कि उन्हें पग-पग पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। न तो इनके पास दो समय की रोटी की कोई व्यवस्था थी और न ही शरीर ढँकने के लिए समुचित वस्त्र थे। वे अपने बाल-बच्चों का पेट भरने में असमर्थ थे इसलिए वर्तमान व्यवस्था के अन्तर्गत वे अपने आपको असन्तुष्ट एवं निराश अनुभव करते थे। शाही करों का अधिकतम् भार इसी वर्ग को वहन करना पड़ता था। कर वसूल करने वाले कर्मचारी इनका सर्वाधिक शोषण करते थे। यदि कोई किसान लगान अदा नहीं कर पाता था तब कर वसूल करने वाले कर्मचारी उसके घर में घुस जाते थे और उसकी वस्तुओं को इधर-उधर
 
फेंककर उसे आतंकित करते थे।


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