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Blog image DR. RAJESH KUMAR SINGH Shared publicly - Jun 20 2021 6:05PM

DIRECTORY KA SASHAN SEMESTER 5 PAPER 501 C11


निदेशक मण्डल का शासन (डायरेक्टरी) (1795-1799 ई०)
 
नेशनल कन्वेंशन ने फ्रांस के लिए एक गणतंत्रात्मक संविधान बनाकर 26 अक्तूबर, 1795 ई० को स्वयं को मंग कर दिया था। नवीन संविधान के अनुसार, फ्रांस में निदेशक मण्डल का निर्माण किया गया। निदेशक मण्डल में पाँच सदस्य थे। नवगठित निदेशक मण्डल में कानों के अतिरिक्त एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं था जिसे प्रतिभाशाली कहा जा सके। निदेशक मण्डल में बार्रा जैसे विलासी, स्वार्थी, भ्रष्ट और साधारण योग्यतावाले लोगों की प्रधानता थी। रोब्सपीयर की मृत्यु के बाद फ्रांस की दशा बड़ी गम्भीर हो गई थी। शासन शिथिल होता जा रहा था। भ्रष्टाचार बढ़ रहा था और न्याय तथा वित्त ठप पड़ गया था। देश में सामाजिक असन्तोष, भ्रटाचार और अनेक बुराइयों का बोलबाला था। ऐसा प्रतीत होता था कि फ्रांस तीव्र ज्वर से मुक्त होने के बाद शक्तिहीन होकर पड़ा हुआ था। अयोग्य और स्वार्थी डायरेक्टर फ्रांस की दशा को सुधाने में सर्वथा असफल रहे। निदेशक मण्डल के चार वर्षों के शासन का इतिहास अनिश्चित एवं संकटपूर्ण रहा और अन्त में उसका पतन हो गया। परिस्थिति को सम्हालने के लिए योग्य, ईमानदार, परिश्रमी और उच्चकोटि के प्रतिभाशाली व्यक्तियों की आवश्यकता थी किन्तु निर्वाचित डायरेक्टर भ्रष्ट, रिश्वतखोर, लालची, अयोग्य और विलासी थे। वे राष्ट्रीय हित के स्थान पर वैयक्तिक स्वार्थ को प्रमुखता देते थे। वास्तविकता तो यह है कि निदेशक मण्डल की सरकार फ्रांस में स्थापित सभी सरकारों में सर्वाधिक निकम्मी और अत्यन्ट भ्रष्ट सरकार थी।
 
निवेशक मण्डल की समस्याएँ निदेशक मण्डल को आन्तरिक एवं वैदेशिक क्षेत्र में अनेक जटिल समस्याओं का मुकाबला करना पड़ा। उस समय फ्रांस की दशा बड़ी ही गम्भीर थी। देश में आन्तरिक विद्रोहों और षड़यंत्रों का कुचक्र चल रहा था। आतंक के शासन से फ्रांसीसी जनता को कोई विशेष लाभ नहीं हुआ था। इसलिए उनका उत्साह निराशा में परिवर्तित हो चुका था। वे आन्तरिक संघर्ष और विदेशी उलझनों से मुक्ति चाहते थे। 'बर्मिदोरियन प्रतिक्रिया के उपरान्त शासन सत्ता पुनः मध्यम वर्ग के हाथ में आ गई थी। मध्यम वर्ग जनसाधारण के हितों के प्रति उदासीन था। इस कारण सर्वसाधारण वर्ग में असन्तोष की भावना बढ़ रही थी जिसके फलस्वरूप फ्रांस में अव्यवस्था फैल गई थी।
 
निवेशक मण्डल के समक्ष दूसरी महती समस्या फ्रांस की दयनीय आर्थिक अवस्था को सुधारने की थी। नेशनल कन्वेंशन ने आर्थिक अवस्था को सुधारने के लिए अनेक उपाय किये थे, किन्तु आन्तरिक विद्रोहों के दमन और विदेशी शक्तियों के साथ निरन्तर युद्ध के कारण फ्रांस की आर्थिक स्थिति बड़ी ही शोचनीय हो गई थी। एसाइनेट के मूल्य में कमी हो गई थी. और विदेशी ऋण भी अत्यधिक बढ़ गया था। फ्रांस की जनता एसाइनेट की वैधता स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी। राजकीय करों से होने वाली आय भी बहुत कम थी। राष्ट्रीय सम्पत्ति का खुलेआम दुरूपयोग किया जाता था। फलस्वरूप राजकोष भी रिक्त हो गया था।
 
फ्रांसीसी चर्च की रूप-रेखा निर्धारित करना भी निदेशक मण्डल की एक अन्य समस्या थी। क्रान्ति के युग में क्रान्तिकारियों की परम्परागत चर्च में आस्था नहीं रह गयी थी। ईसाई पादरी क्रान्ति के दुश्मन समझे जाते थे। नेशनल कन्वेंशन ने कठोरतापूर्वक पादरियों के विधान को लागू किया था और भ्रष्ट पादरियों को देश से निष्कासित कर दिया गया था। आतंक के शासन में ..नास्तिकता का प्रचार हुआ और रोब्सपियर ने फ्रांस में एक नया धर्म चलाने की कोशिश की थी। इससे फ्रांस की जनता में भीषण असन्तोष व्याप्त था। निदेशक मण्डल के समक्ष यह समस्या थी कि किस प्रकार लोगों को धार्मिक सन्तोष प्रदान किया जाय ? इसके अतिरिक्त, फ्रांसीसी समाज का नैतिक स्तर बहुत नीचे गिर गया था और उसको सम्मुन्नत करना अत्यन्त आवश्यक था।
 
निदेशक मण्डल के समक्ष सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण समस्या विदेशी शक्तियों के साथ युद्ध करने की थी। फ्रांस के क्रान्तिकारी स्वतंत्रता, समानता और बन्धुत्व के सिद्धान्तों को तलवार के बल पर पूरे यूरोप में प्रसारित करना चाहते थे। यूरोप के राष्ट्र फ्रांस की क्रान्ति को भय और घृणा की दृष्टि से देखते थे। आतंक के युग में फ्रांस के शासकों ने बड़ी ही उम्र नीति अपनायी थीं जिससे यूरोपीय राष्ट्र भयभीत थे। रूस, आस्ट्रिया, इंगलैण्ड और टर्की को मिलाकर फ्रांस के विरुद्ध द्वितीय गुट कायम किया गया था। ऐसी परिस्थिति में, जबकि निदेशक मण्डल के सदस्य भी अपने पद की सुरक्षा के लिए युद्ध को आवश्यक मान रहे थे, विदेशी शक्तियों के साथ युद्ध करने की समस्या बड़ी ही गम्भीर थी। उनका निश्चित मत था कि शत्रु-देशों के साथ युद्ध करके ही फ्रांस की विशाल और शक्तिशाली सेना को व्यस्त रखा जा सकता है। उनका विश्वास था कि युद्ध में विजय से फ्रांस को सम्मान प्राप्त होगा और निदेशक मण्डल की स्थिति भी सुदृढ़ होगी
 
फ्रांस के शासकवर्ग में भी गहरा मतभेद था। रोब्सपियर के पतन के बाद भी शासनतंत्र गणतंत्र के समर्थकों के हाथ में था। इनका उद्देश्य अपने विरोधियों का दमन करना था। फ्रांस में अभी भी ऐसे लोग थे जो क्रान्ति को समाप्त कर देनाचाहते थे। आन्तरिक मतभेदों के कारण फ्रांस के तत्कालीन राजनीतिक वातावरण में साधारण राजनीतिक प्रतिद्वन्द्विता विभिन्न दलों के जीवन-मरण का प्रश्न बन गया था। निदेशक मण्डल को फ्रांस की आन्तरिक समस्याओं को सुलझाने में कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली थी। निदेशक
 
मण्डल पादरियों के असन्तोष को दूर करने में विफल रही और पादरियों का विरोध निरन्तर बढ़ता ही गया। सामाजिक असमानता को दूर करने के उद्देश्य से कुछ सामाजिक सुधार किए गए थे। संयुक्त परिवार प्रथा का अन्त कर दिया गया और तत्क की प्रथा को अत्यधिक सुगम बना दिया गया था। किन्तु इन सुधारों ने फ्रांस के सामाजिक जीवन को छिन्न-भिन्न कर दिया और भ्रष्टाचार, विलासिता तथा अन्य सामाजिक बुराइयों को जन्म दिया। प्रत्येक परिवार में सदस्य अलग-अलग रहने लगे और मनमाना जीवन व्यतीत करने लगे। पेरिस में नाट्यशालाओं, सिनेमाघरों और होटलों की भरमार हो गई थी। इस प्रकार समाज में भ्रष्टाचार और पाप की सर्वोच सत्ता थी। तत्कालीन फ्रांस में किसी प्रकार का आदर्श शेष नहीं रह गया था।
 
निदेशक मण्डल ने फ्रांस की आर्थिक दशा को सुधारने के उद्देश्य से अनिवार्य कर लगाया और ऋण को वसूल करने की कठोर नीति अपनाई। किन्तु डायरेक्टरों की अयोग्यता और स्वार्थ के कारण निदेशक मण्डल की नीति असफल रही। निदेशक मण्डल के आर्थिक सुधारों ने फ्रांस की आर्थिक दशा को और भी शोचनीय बना दिया। मुद्रा प्रसार, मुखमरी, बेकारी आदि ने फ्रांस के आर्थिक तंत्र की रीढ़ ही तोड़ दी। फ्रांस में चोर बाजारी और भ्रष्टाचार का बोलबाला हो गया । व्यापार शिथिलता आ गई। कृषि तथा उद्योग-धन्धे नष्ट हो गये। इस प्रकार डायरेक्टरों की अयोग्यता, पद लोलुपता, प्रशासन के प्रति उदासीनता, भ्रष्ट जीवन और स्वार्थपरता ने निदेशक मण्डल की आन्तरिक नीति को पूर्णतया विफल कर दिया। इस सरकार के चार वर्ष के शासनकाल में फ्रांस में सामाजिक भ्रष्टाचार, आर्थिक असन्तोष और धार्मिक विरोध अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया था। फलस्वरूप 1799 ई० में निदेशक मण्डल के शासन का पतन हो गया। इस प्रकार 1795 ई० का संविधान अस्थायी प्रमाणित हुआ और अन्त में स्वतंत्रता, समानता एवं बन्धुत्व का इच्छुक फ्रांस का गणतंत्र एक सैनिक एकतंत्र में परिणत हो गया।
 
जिस समय फ्रांस घर और बाहर विषम परिस्थितियों में उलझा हुआ था उस समय एक ऐसे व्यक्ति का फ्रांस के राजनीतिक मंच पर प्रादुर्भाव हुआ जो धीरे-धीरे फ्रांस का भाग्यविधाता बन गया। उस व्यक्ति का नाम या नेपोलियन बोनापार्टी कहा जाता है कि निदेशक मण्डल के चार वर्षों के शासनकाल में फ्रांस इतना पतनोन्मुख हो गया था कि यदि नेपोलियन फ्रांस की सहायता के लिए उस जटिल परिस्थिति के समय न पहुँचता तो फ्रांस और क्रान्ति दोनों का विनाश हो गया होता। निदेशक मण्डल की सरकार युद्ध को बन्द करने के पक्ष में नहीं थी। इसे भय था कि युद्ध बन्द होने पर विदेश से धन आना बन्द हो जायेगा और देश का आन्तरिक संकट बढ़ जायेगा। इसलिए निदेशक मण्डल ने आक्रामक विदेश नीति अपनाई और इसमें सन्देह नहीं कि विदेशी युद्धों में फ्रांसीसी सेना की अभूतपूर्व सफलता ने ही चार वर्ष तक फ्रांस में निदेशक मण्डल के शासन को बनाये रखा।


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