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Asst. Professor (HoD)

Blog image DR. RAJESH KUMAR SINGH Shared publicly - May 10 2021 7:37PM

MA SEMESTER 3 SOCIAL LIFE CC8 VEDIC SOCIETY


सामाजिक अवस्था
 
ऋग्वेदकालीन या पूर्ववैदिक काल-वैदिक आर्यों का समाज पशुपालकों और कृषकों का पा विवाह और पितृमूलक परिवार की संस्था भी उनमें बल चुकी थी। समूचा समाज ही परिवार के नमूने पर. आरंभिक दशा में शिकारी मनुष्यों में स्थिर विवाह की प्रथा नहीं हो सकती थी। अतः, स्थिर परिवार भी नहीं हो सकता था। यही कारण है कि अति प्राचीन काल में समाज की संकर (promiscuity) अवस्था थी, किंतु आर्थिक सहयोग और श्रम विभाजन की आवश्यकताएँ स्त्री-पुरुष के समागम को धीरे-धीरे स्थायी बनाने लगीं। आर्थिक जीवन के विकास के साथ स्थायी विवाह की प्रवृत्ति भी उत्पन्न हुई। धीरे-धीरे मामूलक समाज से पितृमूलक समाज का विकास भी हुआ। मातृमूलक रूसमाज के अवशेष के रूप में वैदिक काल में भी बहुपतिक विवाह (polyandry) की प्रथा चलती रही। दीर्घतमा ऋषि के समय तक विवाह-पद्धति स्थिर नहीं हुई थी।
 
ऋग्वेद के समय संपूर्ण आर्यों का एक वर्ग था। हरेक व्यक्ति को व्यवसाय चुनने को पूर्ण स्वतंत्रता थी। एक ही परिवार में वैद्य कवि और चको पीसनेवाले तक होते थे। प्रारंभ में कोई वर्ग-भेद देखने को नहीं मिलता। ऋग्वेद के दशम मंडल (पुरुकसूक्त) में विराट्-पुरुष की कल्पना की गई है, जिससे चार वर्णों को उत्पत्ति हुई। वैदिक काल में कुल और परिवार बड़े-बड़े दलों में विभक्त थे और उनका निर्माण वर्ण (रंग) और संबंध (साजात्य) पर होता था। आर्य और दास अलग-अलग थे और बहुतेरे दास या दस्यु हो बाद में शूद्र कहलाए, ऐसा अनुमान लगाया जाता है। राजपरिवार के लोग राजन्य या क्षत्रिय, पुरोहितों के वंशज ब्राह्मण और साधारण लोग वैश्य कहलाते थे। 'पुरुषसूक्त' में कहा गया है, "जब उन्होंने आदिपुरुष को विभाजित किया, तब ब्राह्मण उसका मुख था, राजन्य उसकी भुजा था, वैश्य उसकी जाँप और उसके पैरों से शुद्र निकले।" इस उद्घोषणा के बावजूद ऋग्वेदकाल में जाति प्रथा का पूर्ण विकास नहीं हुआ था, क्योंकि हम देखते हैं कि अंतर्जातीय विवाह, व्यवसाय परिवर्तन और सहभोज पर कोई सामाजिक नियंत्रण नहीं था।
 
प्रारंभ में जिस वर्ण व्यवस्था की स्थापना हुई, उसमें विभिन्न पेशेवालों की श्रेणियाँ मात्र थीं। सामान्य जनता 'विशः' कहलाती थी। योद्ध और रथी 'क्षत्रिय' कहलाते थे तथा पुरोहित 'ब्राह्मण' आगे यज्ञ का क्रियाकलाप बहुत बढ़ जाने से ब्राह्मणों का स्थान और भी महत्त्वपूर्ण हो गया था। प्रारंभ में सभी श्रेणियों के बीच परस्पर खान-पान होता था और वैवाहिक संबंध भी चलता था। समाज के विभाजन को ही लोग वर्ण व्यवस्था भी कहते थे। पूर्ववैदिक काल में विवाह और भोजन से संबद्ध बंधन नहीं थे और न ऊँच-नीच का भाव ही विशेष भेद आया और दासों का ही था । ऋम्वेद में वर्णित अनायों की विशेषताओं का उल्लेख हम ऊपर कर चुके हैं। एक बात स्मरणीय है कि पुरुषसूक्त के अतिरिक्त ऋग्वेद में 'वैश्य और 'शूद्र' का कहीं उल्लेख भी नहीं हुआ है। जहाँ तक ब्राह्मण क्षेत्रीय का प्रश्न है, पूर्वर्वेदिक काल में कोई भीअपने कर्म से इन श्रेणियों को प्राप्त कर सकता था। प्रारंभ में आर्य और अनार्य दो वर्ण थे। दोनों में रंग का भेद था। चार वर्णों की उत्पत्ति को हम कर्ममूलक कह सकते हैं। पूर्ववैदिककालीन कर्म परिवर्तनशील थे और इसीलिए वर्ण भी। घरि-धीरे 'वर्ण' जन्मजात हो गया। ब्राह्मण को विद्वान और मनीषी कहा गया है। वशिष्ठ स्वयं तो ब्राह्मण थे, परंतु उनके माता-पिता ब्राह्मण नहीं थे। इससे स्पष्ट है कि ब्राह्मण कर्मजात होते थे, जन्मजात नहीं। 'क्षत्रिय' शब्द वीरता का द्योतक था। देवापि और शांतनु के उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि क्षत्रिय भी जन्मज न होकर कर्मज थे। व्यवसाय, कृषि और वाणिज्य के भार को वहन करनेवाले लोग वैश्य कहलाते थे। पशुपालन वैश्य समुदाय का ही काम था 'शूद्र' शब्द से कृष्णवर्ण के लोगों का तात्पर्य है। 'गौतम' ने शूद्रों को अनार्य कहा है और 'बौधायन' ने कृष्णवर्ण विजित अनार्य ही शुद्र की कोटि में रखे गए, ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है।
 
वैदिक समाज की इकाई परिवार थी। परिवार पितृसत्तात्मक था। पिता या पितामह ही घर का प्रधान होता था। उसे गृहपति कहते थे। परिवार के सभी लोग उसकी प्रधानता मानते थे। गृहपति का पद वंशानुगत था। कभी-कभी भाइयों में पैतृक संपत्ति का बैटवारा भी होता था। संपत्ति का उत्तराधिकारी पुष होता था, पुत्री नहीं सम्मिलित परिवार होने के नाते सब काम सामूहिक ढंग से होता था। सामूहिक उत्तरदायित्व का महत्त्व लोग समझते थे। स्वस्थ पारिवारिक जीवन की नींव पड़ चुकी थी। पति और पत्नी के अतिरिक्त परिवार में माता-पिता, भ्राता भगिनी, पुत्र-पुत्री आदि भी रहते थे। पारस्परिक स्नेह का अभाव नहीं था, परंतु यदा-कदा पारस्परिक स्वार्थों का टकराना अस्वाभाविक नहीं था। इन झगड़ों के चलते ही परिवार बिखर भी जाते थे। सम्मिलित परिवार के पिता के असीमित अधिकार थे, फिर भी वह परिवार की हित-साधना में सब कुछ करने को तैयार रहता था।
 
सामाजिक संस्कारों में विवाह एक महत्त्वपूर्ण संस्कार था। अतिप्राचीन काल में विवाह का बंधन नहीं था और सब स्त्रियाँ अनावृत थीं। दीर्घतमा ऋषि के समय तक यहीं दशा थी। दीर्घतमा ने ही विवाह का नियम जारी किया। अनावरण हटाने का श्रेय श्वेतकेतु औद्दालकि को भी दिया जाता है। विवाह संस्था में श्वेतकेतु ने कुछ सुधार किए. ऐसा अनुमान लगाया जाता है। धीरे-धीरे विवाह-संस्था दूढ़ हो गई, फिर भी वह पत्थर की लकीर नहीं थी। बहुपत्नीत्व से भी वैदिक आर्य अपरिचित नहीं थे। एक विवाह साधारण नियम था। बालविवाह का कहीं उदाहरण नहीं मिलता है। स्त्रियों को समाज में पूरी स्वतंत्रता थी। और वे प्रत्येक कार्य में पुरुषों का हाथ बटाँती थी। परदे का नाम भी नहीं था। वैदिक ऋषि ने तरुणी के प्राकृतिक सौंदर्य की सराहना की है। ऋग्वेद (1.82-4) में उषा का वर्णन करते हुए बताया गया है कि यह नर्तकी की भांति अपने नग्न स्तनों को हिलाती आती है। स्त्रियाँ स्वच्छंद होकर विचरती थीं और पूर्ववैदिककाल में उनपर विशेष अंकुश नहीं था स्त्रियाँ ऊँची शिक्षा पाने के लिए स्वतंत्र होती थीं। युवक-युवतियों को अपना साथी चुनने की पूरी स्वतंत्रता थी। सामाजिक समागम और विनोद के स्थानों में उन्हें परस्पर परिचय और प्रेम करने की स्वतंत्रता थी। विवाह का आदर्श उज्ज्वल और ऊँचा था। विवाह एक पवित्र और स्थायी संबंध माना जाता था। विधवाओं के फिर से विवाह करने में कोई रुकावट नहीं थी और वे प्रायः अपने देवर से विवाह करती थीं। दहेज प्रथा का भी उल्लेख मिलता है और कीमत लेकर लड़की देने का भी।
 
परिवार में पत्नी का अधिक महत्व था। उसमें संतति की विशेष कामना रहती थी। पुत्रों की उत्पत्ति केवल वंश को जीवित रखने के लिए ही नहीं, वरन् परिवार की आर्थिक समृद्धि सैनिक बल और पितरों की आध्यात्मिक तृप्ति के लिए भी आवश्यक थी। जिस समय पुत्र उत्पन्न होता था, बड़ा आमोद-प्रमोद मनाया जाता था; किंतु पुत्री की उत्पत्ति पर ऐसा नहीं होता था। फिर भी कुछ स्त्रियों की गणना ऋषियों की सूची में की जाती है— घोषा, लोपामुद्रा और विश्ववारा। इन्होंने वेद की ऋचाओं की रचना की। जब तक पत्नी यज्ञ में सहयोग प्रदान नहीं करती थी, तब तक यज्ञ संपूर्ण नहीं माना जाता था। अनुलोम और प्रतिलोम विवाहों के उदाहरण भी वैदिक काल में मिलते हैं। सतीप्रथा का अभाव था। नियोगप्रथा प्रचलित थी।
 
आमोद-प्रमोद के लिए आर्य लोग समनों और उत्सवों का संगठन करते थे। संगीत मनोविनोद का प्रमुख साधन था और इसमें भी नृत्य, और वाद्य प्रमुख थे। स्त्री और पुरुष समान रूप से नृत्य में भाग लेते थे। वीणा और करताल की लय के साथ ही नृत्य होता था। आर्यों का गान प्रेम तो उनके गेय सामवेद से ही स्पष्ट है। संगीत के अतिरिक्त घुड़दौड़, द्यूतक्रीड़ा, मल्लयुद्ध आदि भी मनोरंजन के साधन थे। आ का विशेष महत्त्व था ही आर्य लोग जीवन के प्रति उदासीन नहीं थे। रथ घावन अत्यधिक लोकप्रिय था और आगे चलकर यह 'वाजपेय' नामक यज्ञ का प्रधान भाग बन गया। वे लोग जीवन के आनंद का वर्णन करना ही पसंद करते थे और शत्रुओं की मृत्यु को छोड़कर शायद ही कभी मृत्यु का उल्लेख करते थे।अपने कर्म से इन श्रेणियों को प्राप्त कर सकता था। प्रारंभ में आर्य और अनार्य दो वर्ण थे। दोनों में रंग का भेद था। चार वर्णों की उत्पत्ति को हम कर्ममूलक कह सकते हैं। पूर्ववैदिककालीन कर्म परिवर्तनशील थे और इसीलिए वर्ण भी। घरि-धीरे 'वर्ण' जन्मजात हो गया। ब्राह्मण को विद्वान और मनीषी कहा गया है। वशिष्ठ स्वयं तो ब्राह्मण थे, परंतु उनके माता-पिता ब्राह्मण नहीं थे। इससे स्पष्ट है कि ब्राह्मण कर्मजात होते थे, जन्मजात नहीं। 'क्षत्रिय' शब्द वीरता का द्योतक था। देवापि और शांतनु के उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि क्षत्रिय भी जन्मज न होकर कर्मज थे। व्यवसाय, कृषि और वाणिज्य के भार को वहन करनेवाले लोग वैश्य कहलाते थे। पशुपालन वैश्य समुदाय का ही काम था 'शूद्र' शब्द से कृष्णवर्ण के लोगों का तात्पर्य है। 'गौतम' ने शूद्रों को अनार्य कहा है और 'बौधायन' ने कृष्णवर्ण विजित अनार्य ही शुद्र की कोटि में रखे गए, ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है।
 
वैदिक समाज की इकाई परिवार थी। परिवार पितृसत्तात्मक था। पिता या पितामह ही घर का प्रधान होता था। उसे गृहपति कहते थे। परिवार के सभी लोग उसकी प्रधानता मानते थे। गृहपति का पद वंशानुगत था। कभी-कभी भाइयों में पैतृक संपत्ति का बैटवारा भी होता था। संपत्ति का उत्तराधिकारी पुष होता था, पुत्री नहीं सम्मिलित परिवार होने के नाते सब काम सामूहिक ढंग से होता था। सामूहिक उत्तरदायित्व का महत्त्व लोग समझते थे। स्वस्थ पारिवारिक जीवन की नींव पड़ चुकी थी। पति और पत्नी के अतिरिक्त परिवार में माता-पिता, भ्राता भगिनी, पुत्र-पुत्री आदि भी रहते थे। पारस्परिक स्नेह का अभाव नहीं था, परंतु यदा-कदा पारस्परिक स्वार्थों का टकराना अस्वाभाविक नहीं था। इन झगड़ों के चलते ही परिवार बिखर भी जाते थे। सम्मिलित परिवार के पिता के असीमित अधिकार थे, फिर भी वह परिवार की हित-साधना में सब कुछ करने को तैयार रहता था।
 
सामाजिक संस्कारों में विवाह एक महत्त्वपूर्ण संस्कार था। अतिप्राचीन काल में विवाह का बंधन नहीं था और सब स्त्रियाँ अनावृत थीं। दीर्घतमा ऋषि के समय तक यहीं दशा थी। दीर्घतमा ने ही विवाह का नियम जारी किया। अनावरण हटाने का श्रेय श्वेतकेतु औद्दालकि को भी दिया जाता है। विवाह संस्था में श्वेतकेतु ने कुछ सुधार किए. ऐसा अनुमान लगाया जाता है। धीरे-धीरे विवाह-संस्था दूढ़ हो गई, फिर भी वह पत्थर की लकीर नहीं थी। बहुपत्नीत्व से भी वैदिक आर्य अपरिचित नहीं थे। एक विवाह साधारण नियम था। बालविवाह का कहीं उदाहरण नहीं मिलता है। स्त्रियों को समाज में पूरी स्वतंत्रता थी। और वे प्रत्येक कार्य में पुरुषों का हाथ बटाँती थी। परदे का नाम भी नहीं था। वैदिक ऋषि ने तरुणी के प्राकृतिक सौंदर्य की सराहना की है। ऋग्वेद (1.82-4) में उषा का वर्णन करते हुए बताया गया है कि यह नर्तकी की भांति अपने नग्न स्तनों को हिलाती आती है। स्त्रियाँ स्वच्छंद होकर विचरती थीं और पूर्ववैदिककाल में उनपर विशेष अंकुश नहीं था स्त्रियाँ ऊँची शिक्षा पाने के लिए स्वतंत्र होती थीं। युवक-युवतियों को अपना साथी चुनने की पूरी स्वतंत्रता थी। सामाजिक समागम और विनोद के स्थानों में उन्हें परस्पर परिचय और प्रेम करने की स्वतंत्रता थी। विवाह का आदर्श उज्ज्वल और ऊँचा था। विवाह एक पवित्र और स्थायी संबंध माना जाता था। विधवाओं के फिर से विवाह करने में कोई रुकावट नहीं थी और वे प्रायः अपने देवर से विवाह करती थीं। दहेज प्रथा का भी उल्लेख मिलता है और कीमत लेकर लड़की देने का भी।
 
परिवार में पत्नी का अधिक महत्व था। उसमें संतति की विशेष कामना रहती थी। पुत्रों की उत्पत्ति केवल वंश को जीवित रखने के लिए ही नहीं, वरन् परिवार की आर्थिक समृद्धि सैनिक बल और पितरों की आध्यात्मिक तृप्ति के लिए भी आवश्यक थी। जिस समय पुत्र उत्पन्न होता था, बड़ा आमोद-प्रमोद मनाया जाता था; किंतु पुत्री की उत्पत्ति पर ऐसा नहीं होता था। फिर भी कुछ स्त्रियों की गणना ऋषियों की सूची में की जाती है— घोषा, लोपामुद्रा और विश्ववारा। इन्होंने वेद की ऋचाओं की रचना की। जब तक पत्नी यज्ञ में सहयोग प्रदान नहीं करती थी, तब तक यज्ञ संपूर्ण नहीं माना जाता था। अनुलोम और प्रतिलोम विवाहों के उदाहरण भी वैदिक काल में मिलते हैं। सतीप्रथा का अभाव था। नियोगप्रथा प्रचलित थी।
 
आमोद-प्रमोद के लिए आर्य लोग समनों और उत्सवों का संगठन करते थे। संगीत मनोविनोद का प्रमुख साधन था और इसमें भी नृत्य, और वाद्य प्रमुख थे। स्त्री और पुरुष समान रूप से नृत्य में भाग लेते थे। वीणा और करताल की लय के साथ ही नृत्य होता था। आर्यों का गान प्रेम तो उनके गेय सामवेद से ही स्पष्ट है। संगीत के अतिरिक्त घुड़दौड़, द्यूतक्रीड़ा, मल्लयुद्ध आदि भी मनोरंजन के साधन थे। आ का विशेष महत्त्व था ही आर्य लोग जीवन के प्रति उदासीन नहीं थे। रथ घावन अत्यधिक लोकप्रिय था और आगे चलकर यह 'वाजपेय' नामक यज्ञ का प्रधान भाग बन गया। वे लोग जीवन के आनंद का वर्णन करना ही पसंद करते थे और शत्रुओं की मृत्यु को छोड़कर शायद ही कभी मृत्यु का उल्लेख करते थे।वेशभूषा पर भी उनका विशेष ध्यान रहता था। महोत्सवों में स्त्रियाँ सुसज्जित होकर सूर्य की किरणों स समुद्भासित होती थीं। वैदिक पोशाक के तीन भाग थे अंदर के वस्त्र को नौवी कहते थे, दूसरे को वास या परिधान और आच्छादन के लिए जो वस्त्र होता था, उसे अधिवास, अक या द्रापि कहते थे। पोशाकें विभिन्न रंगों की होती थी और हरिण के चमड़े तथा ऊन की बनती थीं। कपड़ों पर जरी का काम किया होता था। स्वर्णाभूषण और मालाओं का भी व्यवहार होता था। उष्णीष का व्यवहार और पुरुष दोनों ही करते थे। खिया वेणियाँ धारण करती थीं। आभूषणों में हार, कवच, कुंडल, केयूर, कंकण, नूपुर, अंगद, गजरे और कंठ थे। बालों में कंघी करने का प्रचलन था। सुगंधित तेलों का भी प्रयोग किया जाता था ब्रह्मचारी मृगचर्म का प्रयोग करते थे।
 
खान-पान बहुत सादा था। खेती की मुख्य उपज 'बीडी' और 'यव' थी, किंतु 'यव' शब्द में गेहूँ भी सम्मिलित लगता है। दूध, घी, मांस और अनाज सादे रूप में मुख्य भोजन थे। आर्य लोग पूरे मांसाहारी थे। यद्यपि वे गाय को अध्या (न मारने लायक) समझने लग गए थे, फिर भी विवाह के समय या अतिथि के आने पर बैल अथवा बाँझ गाय को मारकर खिलाने-खाने की प्रथा प्रचलित थी। सोमरस तथा सुरा आर्यों के मुख्य पेय थे।
 
सामाजिक संगठन का आधार परिवार था। परिवार के सभी सदस्य एक ही घर में रहते थे। घर लकड़ी या नरकट का बनता था। स्त्रियों के लिए कमरे और बैठक के अतिरिक्त प्रत्येक घर में अग्निशाला भी होती थी। पुत्री की अपेक्षा पुत्र को परिवार में ज्यादा महत्त्व दिया जाता था। कृत्रिम कूप निर्मित करना भी वे जानते थे, अर्थात उनके घर-द्वार व्यवस्थित थे। वैदिक आर्य जीवन संघर्ष के साथ-ही-साथ सौंदर्य के भी उपासक थे। जीवन की सभी उपलब्धियों को वे चाहते थे और सुखी जीवन के जितने साधन होते हैं, उन्हें प्राप्त करना वे अपने जीवन का उद्देश्य मानते थे। निराशा नाम की कोई चीज वे जानते ही नहीं थे।
 
वर्ण व्यवस्था के साथ ही बाद में वर्णाश्रमधर्म का भी विकास हुआ। वर्णाश्रम एक आदर्श था, जिसके कठिन नियमों का पालन तीन उच्च जातियों के सदस्यों को करना पड़ता था। वर्णाश्रम में सर्वप्रथम ब्रह्मचारी, उसके बाद गृहस्थ, फिर वानप्रस्थ और अंत में संन्यास की प्रथा थी। 'वर्ण-व्यवस्था' की तरह 'वर्णाश्रम का बीज भी पूर्ववैदिक काल के साहित्य में मिलता है। प्राचीन भारतीय विचारकों का यह मत था कि प्रत्येक मनुष्य पर चार प्रकार का ऋण होता है मनुष्य का ऋण देव ऋण, ऋषि ऋण पितृ ऋण मनुष्य का ऋण अपने पड़ोसियों की सेवा और आतिथ्य से चुक जाता है; देवताओं का ऋण यज्ञों द्वारा उतारा जाता है, पितरों का ऋण संतान की उत्पत्ति से और ऋषियों के ज्ञान का ऋण अध्ययन तथा अध्यापन से चुकता है। प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि वह अपना ऋण उतारे। इसलिए चार आश्रमों की व्यवस्था की गई। प्रथम आश्रम (ब्रह्मचर्य) में मनुष्य अपना पूर्ण विकास करता था, द्वितीय (गार्हस्थ्य) में पितरों और मनुष्यों का ऋण उतारता था, तृतीय (वानप्रस्थ) और चतुर्थ (संन्यास) में वह देवता एवं ऋषियों से ऋण होता था।
 
उत्तरवैदिक काल – उत्तरवैदिक काल में भारतीय विचारों की ठोस बुनियाद पड़ी। इसी काल में आर्यों ने समाज संस्थान की नीव डाली। जातिभेद आरंभ में केवल आयोँ और दासों का ही था, परंतु आर्यों की पवित्रता बनाए रखने के लिए नियम और बंधन बनाए जाने लगे। इस काल में दासकन्या किसी आर्य की धर्मपत्नी नहीं हो सकती थी। रमण के लिए काली जाति की स्थियाँ रखना, फिर भी वर्जित नहीं था। यो दास आर्यों के समाज के अंग बन चुके थे, 'शूद्रों' के रूप में, फिर भी शूद्र के साथ विवाह-संबंध घृणित माना जाता था। स्वयं आर्यों में भी विभिन्न श्रेणियाँ रूप पकड़ रही थीं। उदाहरणार्थ रथेष्ट या रथी साधारण पदाति से हैसियत में ऊँचे थे और राजकीय पदों पर स्वभावतः उन्हीं की नियुक्ति अधिकतर होता थी। राजन्य का दर्जा उनसे भी ऊँचा था। राजन्यों और रथेष्टों को मिलाकर क्षत्रियों की श्रेणी बनती थी। ज्ञान और विचार के मार्ग को अपनाकर चलनेवाले लोग ब्राह्मण की कोटि में थे। ज्ञान के साथ त्याग का भाग जुड़ा हुआ था। नियम कानून की विवेचना करनेवाले भी वे ही लोग थे। मंत्रधर और न्याय विभाग का कार्य उन्हीं के जिम्मे था। 'विशः' के साधारण लोग वैश्य थे। वैश्य गृहपति राष्ट्र के आधार पर थे। वैश्य समुदायों में भी गण बनने लगे श्रेष्ठी शब्द से हमें गण का संकेत भी मिलता है। इस युग में श्रम को विभिन्नता भी प्रकट होने लगी। अब अन्य शिल्पों और व्यवसायों के समूह या गण भी पृथक अंगों के रूप में प्रकट होने लगे थे। शूद्र तो अलग थे ही। उत्तरवैदिक काल में शास्त्रकारों ने प्रथम बार चारों वर्णों के कर्तव्यों
 
1. सायन ने पंचजना का अर्थ इस प्रकार किया है-चत्वारो वर्णाः निषादपंचमा: यह उत्तर वैदिक काल के सामाज का हो द्योतक है।का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया और उनके पृथक-पृथक नियम बनाए। शिल्पियों को शुद्रों के समकक्ष मानने की कुप्रथा का आरंभ इसी युग से हुआ। शुद्रों को अपने यज्ञ से वंचित किया गया। अग्नि को दी जानेवाली दूध को हवि शूद्र के स्पर्श से अपवित्र समझी जाने लगी। शूद्रों को हेय की दृष्टि से देखा जाता था। जहाँ एक और ब्राह्मण और क्षत्रिय विशेषाधिकार का उपयोग कर रहे थे, वहाँ दूसरी ओर वैश्य और शुद्र ऐसे अधिकारों से वंचित थे। उनके संबोधन के ढंग भी अलग थे। यो दोनों वर्गों के लोग शोषित थे। ब्राह्मणों का अधिकार और सम्मान बढ़ गया था।
 
जाति-पारिवर्तन अब कठिन हो गया था। उच्चवर्ग के लोग अपने से नीची जाति में विवाह कर सकते थे. परंतु नीची जाति के लोगों के लिए उच्च वर्गों में विवाह करना असंभव था। यो ब्राह्मणों और क्षत्रियों के भी बीच संघर्ष का संकेत मिलता है, फिर भी उन दोनों का संबंध अपेक्षाकृत अच्छा हो कहा जाएगा। व्यापारी, रथनिर्माता, लोहार, बढ़ई, चमार, कर्मकार, मल्लाह आदि उपजातियों का उल्लेख भी इस युग में मिलता है। किंतु, इनलोगों का सामाजिक मूल्य दिनानुदिन घटता जा रहा था। व्रयों और निषादों का भी उत्तरवैदिक कालीन साहित्य में उल्लेख मिलता है। 'उत्तरवैदिक काल में वर्ण व्यवस्था अपने निश्चित वर्ग आकार और वर्ग संघर्ष की ओर द्रुतगति से बढ़ती जा रही थी। श्रम विभाजन से पेशेवर दल निर्मित हो गए। समाज में जैसे-जैसे ब्राह्मणों का महत्त्व बढ़ता गया, वर्णों का पारस्परिक संपर्क अश्रद्धा की दृष्टि से देखा जाने लगा। यदा-कदा पारस्परिक और सामाजिक संपर्क भी देखे जाते हैं, जैसे- ब्रह्मर्षि व्यवन ने क्षत्रिय सर्यात की पुत्री सुकन्या से विवाह किया; विदेह के जनक, काशी के अजातशत्रु और पंचाल के प्रवाहण जैवलि ने ब्रह्मज्ञान से ख्याति प्राप्त की और राजन्य देवापि ने अपने भाई राजा शांतनु के अध में प्रमुख पुरोहित का कार्य किया। विद्या का महत्त्व इस युग में काफी बढ़ गया था। पुरानी मान्यताएँ बड़ी तेजी से बदल रही थीं।
 
इस काल में वर्णाश्रम व्यवस्था परिपक्व हुई। इसका आधार दृढ़ हो गया, अतः वर्णों का आधार कर्म न होकर जन्म हो गया। इस समय आर्यों पर आर्येतर जातियों का स्पष्ट प्रभाव पड़ा। उनमें वर्ण जन्म के आधार पर निश्चित होता था। इस काल में ऊँच-नीच की भावना जाग्रत होने लगी। आश्रम व्यवस्था की स्थापना भी इसी युग में पूर्णरूपेण हुई। इसकी विवेचना हम ऊपर कर चुके हैं।
 
'अथर्ववेद' में स्पष्ट रूप से राजन्य, वैश्य, शूद्र और आर्य जैसे सामाजिक विभागों का उल्लेख है। 'वाजसनेयी संहिता' में ब्राह्मण, क्षत्रिय, शुद्र और आर्य का उल्लेख मिलता है। इन चार वर्णों के अतिरिक्त इस काल में चांडाल, पौल्कस, निषाद, उग्र, आयोगव, मागध, वैदेहक आदि जातियों का उल्लेख भी विभिन्न ग्रंथों में मिलता है। आंध, पुंडू, शबर, पुलिंद, मूर्तिव आदि अनार्य जातियों का उल्लेख भी तत्कालीन साहित्य में मिलता है। इन लोगों की गणना किस कोटि में हो, यह निश्चित रूप से कहना कठिन है; परंतु इतना कहा जा सकता है कि इस काल में वर्गीकरण की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही थी।
 
उत्तरवैदिक काल में आर्यों का विस्तार हुआ और वे लोग जंगलों को साफ करते हुए आगे बढ़ते गए। जनसंख्या की वृद्धि के परिणामस्वरूप बड़े-बड़े ग्रामों और नगरों का विकास हुआ। युग में भी अधिकतर आर्य ग्रामों में ही संगठित थे। उनके सम्मिलित परिवारों का प्रमाण मिलता है। कच्ची और पाकीटों से घर बनता था और उसमें मिट्टी और लकड़ी का भी व्यवहार होता था। घर में अग्निशाला, अतिथिशाला और पशुशाला की व्यवस्था थी। घर में पलंग, कुर्सी, बेंच, बरतन, टोकरी, कलश, चाकू, चम्मच आदि उपभोग की वस्तुओं के होने का भी प्रमाण मिलता है।
 
शूद्रों और नारियों को अवस्था करीब-करीब एक जैसी थी। 'ऐतरेयब्राह्मण' में कहा गया है कि शुद्ध दूसरे का सेवक है, जिसका इच्छावश निष्कासन तथा वध किया जा सकता है। इस काल में नारियों को शिक्षा दी जाती थी। गार्गी, वाचक्नवी और मैत्रेयी के दृष्टांतों से यह स्पष्ट है। फिर भी नारियों की स्थिति विशेष स्पृहणीय नहीं थी। संपत्ति पर उनका अधिकार नहीं होता था। कन्या का जन्म हो दुख का कारण समझा जाता था। 'ऐतरेयब्राह्मण' में पुत्री को कृपण कहा गया है। बहुविवाह की प्रथा थी, किंतु एकपतित्व को हम साधारण नियम मान सकते हैं। पुनर्विवाह या विधवा विवाह का प्रचलन भी था। सतोप्रथा के संबंध में कोई प्रामाणिक आधार नहीं मिलता। यदा-कदा अंतर्जातीय विवाह के उल्लेख मिलते हैं, फिर भी सजातीय विवाह की ही प्रधानता थी। इस काल में गोत्र का उदय हो चुका था। 'अथर्ववेद' के अनुसार गोत्र का अर्थ संबंधित व्यक्तियों का समूह है।


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Comments (1)
user image NUPUR TIRKEY Shared publicly - 05-07-2021 08:47:26

Nupur tirkey