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Blog image DR. RAJESH KUMAR SINGH Shared publicly - May 5 2021 5:35PM

BA SEMESTER 3 CC7 AIBAK


कुतबुद्दीन ऐबक ऐबक एक अनुभवी व्यक्ति था। उसने उत्तरी भारत में लम्बे समय तक निवास किया था। 1192 से 1206 तक वह भारत में गौरी के प्रतिनिधि के रूप में काम करता रहा था। इस काल में उसने उल्लेखनीय सैनिक गतिविधियाँ जारी रखी थीं। उसने अजमेर के समीपवर्ती क्षेत्रों में राजपूतों के विद्रोहों का दमन किया था। उत्तरी भारत में उसकी शक्ति की सुदृढ़ता को देखते हुए ही उसके अन्य प्रतिद्वन्द्वियों ने उसका एकाधिकार मान लिया था। अपने शासन के आरम्भ में ऐबक ने इन दोनों प्रतिद्वन्द्वियों अर्थात यल्दोज और कुबाचा के प्रति मित्रता की नीति अपनाई। लेकिन यह स्थिति अधिक दिनों तक बनी नहीं रह सकी और जल्दी ही ऐबक को समस्याओं का सामना करना पड़ा । ऐबक के सामने सबसे बड़ी समस्या यल्दोज द्वारा दिल्ली सल्तनत पर सम्प्रभुता के दावे के कारण उत्पन्न हुई। मोहम्मद गौरी की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी के रूप में उसके भतीजे गेयासुद्दीन महमूद को स्वीकार किया गया था, परन्तु महमूद ने गजनी का राज्य यल्दोज को सौंप दिया था, जबकि भारतीय क्षेत्र ऐबक के हवाले कर दिए थे। यल्दोज अपने आपको मुहम्मद गौरी का वास्तविक उत्तराधिकारी मानता था और इस रूप में वह पंजाब के क्षेत्र पर भी अधिकार करने का इच्छुक था। इस उद्देश्य से उसने पंजाब पर चढ़ाई भी की लेकिन ऐबक ने उसे पराजित कर दिया और गजनी के नगर पर भी अधिकार कर लिया। इसी अवसर पर ऐबक ने गेयासुद्दीन महमूद की दासता से मुक्तिपत्र प्राप्त किया जिस कारण वह एक स्वतन्त्र व्यक्ति बन सका। कुछ इतिहासकारों अनुसार गैयासुद्दीन महमूद ने उसे दिल्ली पर शासन करने का अधिकार पत्र भी प्रदान किया। गजनी में ऐबक का निवास संक्षिप्त रहा क्योंकि वहाँ की प्रजा यल्दोज की समर्थक थी और जी ही यल्दोज से गजनी पर पुनः अधिकार कर लिया। ऐबक ने भारत लौटते हुए लाहौर में निवास ग्रहण किया ताकि सीमान्त क्षेत्र पर निगरानी रख सके। ऐबक के अधीन सल्तनत की राजधानी लाहौर में ही रही । ऐबक की दूसरी समस्या पूर्वी सीमान्त की थी। बंगाल का क्षेत्र बख्तियार खिलजी द्वारा जीता गया था परन्तु उसकी हत्या अलीमरदान द्वारा कर दी गई। अलीमरदान के विरुद्ध मुहम्मद शेरा ने विद्रोह कर दिया और उसे कैद कर लिया। अलीमरदान किसी तरह दिल्ली भागने में सफल हुआ। उसने ऐबक से सहायता माँगी और ऐबक के आदेश पर अवध के गर्वनर कैमाज समी ने मुहम्मद शेरा को पराजित कर अलीमरदान को पुनः बंगाल का शासक बना दिया। अलीमरदान ऐबक के प्रति स्वामिभक्त रहा और बंगाल पर दिल्ली का प्रभुत्व बना रहा । ऐबक को राजपूतों के विद्रोह की समस्या का भी सामना करना था लेकिन इस दिशा में वह निर्णायक कार्रवाई नहीं कर सका क्योंकि 1210 में एक दुर्घटना में वह चौगान खेलते हुए घोड़े से गिर गया और घायल होने के कारण उसकी मृत्यु हो गई। भारत में ऐबक की गतिविधियों को तीन चरणों में विभक्त किया जा सकता है। 1192. से 1206 तक उसने उत्तरी भारत में मुहम्मद गौरी के सहायक के रूप में तुर्की की सत्ता की स्थापना में सक्रिय योगदान दिया। 1206 से 1208 तक उसने यल्दोज और कुबाचा जैसे प्रतिद्वन्द्वियों से सम्बन्ध निर्धारित करने और दिल्ली सल्तनत को एक निश्चित अस्तित्व दिलाने का प्रयास किया। 1208 से 1210 के बीच उसने भारत के स्वतन्त्र शासक के रूप में कार्य किया। इसी काल में दिल्ली सल्तनत की रूपरेखा प्रस्तुत हुई और ऐबक ने गौरी द्वारा विजित क्षेत्रों को सुरक्षित एवं संगठित बनाए रखा । एक शासक के रूप में ऐवक की उपलब्धियों को सभी इतिहासकारों ने सराहा है। मुहम्मद हबीब के शब्दों में गेयासुद्दीन महमूद, यल्दोज और कबाचा के प्रति उसकी नीति उसकी राजनीतिक कुशलता का प्रमाण है। उसने उनके विरुद्ध हर समय शक्ति प्रदर्शन न कर नम्रता और अनुग्रह से ही काम लिया, जो उस समय की अनिश्चित परिस्थिति में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। डा० हबीबुल्लाह के अनुसार "उसमें तुर्कों की निर्भीकता और फारसियों की परिष्कृत अभिरुचि पाई जाती थी। उसकी उदारता के कारण उसे 'लाख बया' (लाखों का दान करने वाला) कहा गया। ऐबक ने दिल्ली नगर का विकास भी किया। दिल्ली और अजमेर में उसने मस्जिदों का निर्माण कराया । दिल्ली में ही कुतुबमीनार के निर्माण का काम उसने आरंभ कराया जिससे उत्तरी भारत में एक नई स्थापत्य शैली के विकास की पृष्ठभूमि बनी। उसने भारत में तुर्क शासक वर्ग ॐ विविध घटकों के बीच एकता और संगठन बनाए रखा जिससे नव-स्थापित सल्तनत को एक जबूत आधार मिला । ऐबक की अकस्मात मृत्यु के बाद फिर एक बार उत्तराधिकार की समस्या उठ खड़ी हुई क्योंकि उसका कोई पुत्र नहीं था। कुछ तुर्क सरदारों ने आरामशाह नामक एक नवयुवक को सल्तनत का शासक घोषित कर दिया लेकिन अधिकतर सरदार उसकी सत्ता के विरोधी थे और उसके खिलाफ विद्रोह भड़क उठे । कुछ महीनों के संक्षिप्त शासन के पश्चात् आरामशाह को सत्ता से हटाकर इल्तुतमिश ने शासन पर अधिकार कर लिया ।



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