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Blog image DR. RAJESH KUMAR SINGH Shared publicly - May 3 2021 4:58PM

BA PART 2 SEMESTER 3 ILTUTMISH


इल्तुतमिश इलवरी जाति का तुर्क था। उसका पिता इलक खाँ एक कबायली सरदार था। उसका राजनीतिक जीवन ऐबक के दास के रूप में आरम्भ हुआ लेकिन मुहम्मद गौरी की अनुशंसा पर ऐबक ने उसे दासता से मुक्त कर दिया था। आगे चलकर ऐवक ने अपनी एक बेटी का विवाह इल्तुतमिश के साथ कर दिया। दिल्ली का शासक बनने पर ऐबक ने इल्तुतमिश को बदायूँ का प्रशासक नियुक्त किया जो कि उस समय में एक महत्वपूर्ण पद या । बदायूँ में ही इल्तुतमिश को आरामशाह के विरोधियों के द्वारा गद्दी पर अधिकार करने का निमंत्रण प्राप्त हुआ।
 
दिल्ली के सल्तनत के आरम्भिक तुर्क सुल्तानों में इल्तुतमिश का व्यक्तित्व अत्यन्त महत्वपूर्ण और प्रभावशाली हैं। अनिश्चित राजनीतिक परिस्थितियों में और अत्यन्त गम्भीर संकट के काल में इल्तुतमिश दिल्ली का शासक बना था। अपनी योग्यता और प्रतिभा के बल पर उसने दिल्ली सल्तनत को सुदृढ़ एवं शक्तिशाली रूप प्रदान किया इल्तुतमिश की उपलब्धियों को समझने के लिए अथवा दिल्ली सल्तनत के प्रति उसके योगदान का मूल्यांकन करने के लिए यह आवश्यक है कि उन समस्याओं की ओर ध्यान दिया जाए जो इल्तुतमिश के राज्यारोहण के समय
 
इल्तुतमिश को अत्यन्त कठिन परिस्थितियों का सामना करना था। उसके पूर्व ऐबक ने अपने संक्षिप्त शासनकाल में दिल्ली सल्तनत की स्थापना का काम आरम्भ तो किया किन्तु उसे पूरा करने में असमर्थ रहा । इल्तुतमिश के लिए यह अनिवार्य था कि इस नवस्थापित राज्य को सुदृढ़ता प्रदान करें और इसके लिए एक कुशल प्रशासनिक व्यवस्था का निर्माण करे, किन्तु इन दोनों कामों के लिए पहले यह आवश्यक था कि इल्तुतमिश की अपनी स्थिति सुदृढ़ हो ।
 
इल्तुतमिश के समक्ष निम्नलिखित मुख्य समस्याएँ थीं :
 
1. विरोधी सामन्तों, विशेषकर कुत्बी और मुइज्जी सामन्तों का दमन ।
 
2. अपने प्रतिद्वन्द्वियों यल्दोज और कुबाचा का दमनः ।
 
3 राजपूताना और बंगाल के उपद्रवों और विद्रोहों का दमन ।
 
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मंगोल आक्रमण से सल्तनत की रक्षा और
 
5 सल्तनत के लिए प्रशासनिक व्यवस्था का निर्माण ।
 
उसके 25 वर्षीय शासन काल में इन सभी समस्याओं का समाधान हुआ। इस काल को तीन चरणों में विभक्त किया जा सकता है। प्रथम चरण 1210 से 1220 तक रहा, जबकि उसने अपने विरोधियों एवं प्रतिद्वन्द्वियों का दमन किया। सर्वप्रथम उसने उन सामन्तों की शक्ति को कुचला जो गद्दी पर उसके अधिकार का विरोध कर रहे थे। इनमें अधिकतर कन्ची और मुइज्जी सामन्त थे, जो इस आधार पर इल्तुतमिश के विरुद्ध हो रहे थे कि वह एक दास का भी दास है। अतः राजगद्दी पर उसका अधिकार अनुचित है। इल्तुतमिश ने सर्वप्रथम इन सामन्तों को युद्ध में पराजित किया। इसके बाद उसने क्रमिक रूप से सभी महत्वपूर्ण पदों से इन सामन्तों को वंचित किया। उसने अपने विश्वसनीय 40 दासों का एक नया दल संगठित किया । जो 'चालीसा दल कहा जाता है। इस दल के सदस्यों को सभी बड़े पदों पर नियत करके इन्तमिश ने अपनी स्थिति सुदृढ कर ली ।इल्तुतमिश के प्रतिद्वन्दियों में सर्वप्रथम पदोज के साथ उसका संघर्ष हुआ। यल्दोज गजनी का शासक था और दिल्ली पर भी अपनी संप्रभुता का दावा करता था। यद्यपि उसे ऐवक ने पराजित किया था, परन्तु इल्तुतमिश की आरम्भिक कठिनाइयों को देखते हुए यल्दोज ने पुनः अपना दावा दोहराया था। 1215-16 के बीच इल्तुतमिश ने पल्दोज को पुनः पराजित किया और इस समस्या का समाधान किया । यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण उपलब्धि थी क्योंकि इसके साथ ही दिल्ली सल्तनत और गजनी के साथ सम्पर्क सदा के लिए टूट गया और सल्तनत का विकास एक स्वतन्त्र उत्तर भारतीय राज्य के रूप में हुआ जिसका मध्य एशियाई राजनीति से कोई सम्बन्ध नहीं था। इसी समय उसने अपने दूसरे विरोधी कुबाबा के विरुद्ध भी कार्रवाई की, किन्तु उसे पूर्ण सफलता नहीं मिली ।
 
दूसरा चरण 1221 से 28 के बीच है। इस काल का आरम्भ एक अत्यन्त गम्भीर संकट के साथ हुआ जब महान मंगोल विजेता चंगेज खाँ अपनी सेना के साथ दिल्ली सल्तनत की सीमा पर आ पहुँचा। चंगेज खाँ इस ओर ख्वारिज्म के राजकुमार मंगबरनी का पीछा करता हुआ आया था, जो कि इल्तुतमिश से मंगोलों के विरुद्ध सहायता आकांक्षी या इल्तुतमिश ने कूटनीति से काम लेते हुए मंगबरनी को कोई सहायता नहीं दी। उसके आचरण से चंगेज खौं संतुष्ट रहा और उसने भी दिल्ली सल्तनत पर आक्रमण नहीं किया, इस प्रकार यह भंयकर संकट आसानी से टल गया । इसका एक अन्य लाभ इल्तुतमिश को हुआ। मंगबरनी ने सिंध नदी के किनारे के क्षेत्र में कुबाचा की शक्ति को बहुत कमजोर कर दिया। अतः इसका लाभ उठाकर कुबाचा पर इल्तुतमिश ने चढ़ाई कर दी और 1224 में कुबाचा को पराजित करके उसने सिंघ और मुल्तान को भी दिल्ली सल्तनत में मिला लिया। इस प्रकार दिल्ली सल्तनत के क्षेत्रों में पहली बार उल्लेखनीय विस्तार हुआ । 1
 
इसी अवधि में पूर्वी सीमा की समस्या पर भी इल्तुतमिश ने ध्यान दिया। बंगाल का प्रान्त ऐबक के समय में भी स्वतन्त्र होने का प्रयास कर चुका था। इल्तुतमिश की आरम्भिक समस्याओं का लाभ उठाकर बंगाल में हेसामुद्दीन इवज ने स्वतन्त्र सत्ता ग्रहण कर ली थी और बिहार, उड़ीसा एवं कामरूप के क्षेत्रों में अपनी शक्ति का विस्तार कर लिया था। इल्तुतमिश ने बंगाल के विरुद्ध दो सैनिक अभियान किए। 1227 तथा 1229 के अभियानों के फलस्वरूप बंगाल में स्थित लखनौती का राज्य दिल्ली के नियंत्रण में आ गया और बिहार का क्षेत्र बंगाल से अलग करके दिल्ली सल्तनत में मिला लिया गया। इस प्रकार अपने राज्य की पूर्वी सीमा को इल्तुतमिश ने सुदृढ एवं सुरक्षित बना लिया ।
 
तीसरा चरण 1229 से आरम्भ हुआ और 1236 में समाप्त हुआ। इसमें इल्तुतमिश ने राजपूताना की समस्या का समाधान किया और प्रशासनतन्त्र को सुव्यवस्थित किया । राजपूताना का क्षेत्र ऐबक के शासनकाल से ही विद्रोहों और उपद्रवों का केन्द्र बना हुआ था, जहाँ राजपूत सरदार तुर्की की सत्ता का अन्त करने के लिए संघर्ष छेड़े हुए थे। अपने संक्षिप्त शासन काल में ऐबक इस समस्या का समाधान करने में असमर्थ रहा था । अतः इल्तुतमिश ने राजपूताना में कार्रवाई आरम्भ की। उसका पहला सफल अभियान 1224 में रणवम्बौर पर अधिकार के साथ पूरा हुआ। अगले पाँच वर्षों में इल्तुतमिश ने इस क्षेत्र में कई अभियान किए और अनेक क्षेत्रों को जीता जिसमें अजमेर, नागौर और थंगनीर के नाम उल्लेखनीय हैं। अन्तिम महत्वपूर्ण अभियान 1231 में ग्वालियर के विरुद्ध हुआ। इस प्रकार इल्तुतमिश ने उत्तरी और मध्य भारत के राजपूत शासकों को अपने नियन्त्रण में रखा ।उपलब्धियाँ एक विजेता और सेनानायक के रूप में की उपरोक्त उपल अत्यन्त प्रभावशाली हैं। उसने एक असंगठित और निर्बल राज्य को न केवल शक्ति और प्रदान की बल्कि उसके क्षेत्रों में भी पर्याप्त विस्तार किया और उसके विरोधियों की शक्तियों को कुचल डाला । इसमें कोई सन्देह नहीं कि दिल्ली सल्तनत के आरम्भिक सुदृढीकरण का काम इल्तुतमिश द्वारा ही सम्पन्न हुआ, किन्तु इल्तुतमिश मात्र एक विजेता ही नहीं था बल्कि एक योग्य प्रशासक भी था। उसी ने दिल्ली सल्तनत की प्रशासनिक व्यवस्था के निर्माण का काम आरम्भ किया। इसके लिए सर्वप्रथम उसने 1229 में बगदाद के अब्बासी खलीफा से एक मा स्वीकृति पत्र प्राप्त किया जिसके द्वारा उसे दिल्ली सल्तनत के सुल्तान के रूप में मान्यता प्राप्त हुई। यह एक महत्वपूर्ण घटना थी क्योंकि अभी तक दिल्ली सल्तनत के स्वतन्त्र अस्तित्व को वैधानिक रूप से स्वीकृति प्राप्त नहीं हो सकी थी। खलीफा के स्वीकृति पत्र से इल्तुतमिश की स्थिति भी सुदृढ हुई। सुल्तान के रूप में अब उसकी सत्ता का विरोध उसकी मुस्लिम प्रजा द्वारा सम्भव नहीं रहा। अन्तर्राष् स्तर पर इस स्वीकृति द्वारा इल्तुतमिश एवं दिल्ली सल्तनत की स्वतन्त्रता को मान्यता प्राप्त हो गई ।
 
प्रशासनिक उपाय :
 
आन्तरिक प्रशासन के क्षेत्र में इल्तुतमिश का योगदान तीन क्षेत्रों में उल्लेखनीय है, इकतादारी व्यवस्था, मुद्रा प्रणाली एवं सैन्य संगठन ।
 
इल्तुतमिश ने अपने राज्य को अनेक छोटे-बड़े भू-खण्डों में विभक्त कर दिया जिन्हें इक्का कहते थे, इनके अधिकारी इक्कादार कहलाते थे। बड़े क्षेत्रों के इक्तादार प्रान्तीय गर्वनर के रूप में थे जो कानून और व्यवस्था की देख-रेख, लगान की वसूली, मुकदमों की सुनवाई और सैनिक सेवा प्रदान करने का कार्य करते थे। छोटे क्षेत्रों के इक्कादार केवल सैनिक सेवा प्रदान करते थे। दोनों श्रेणियों के इक्तादारों को वेतन के रूप में अपने इक्ता से लगान वसूलने का अधिकार था। इल्तुतमिश ने इस व्यवस्था का उपयोग उत्तर भारत की सामन्तवादी प्रथा को समाप्त करने एवं केन्द्रीय प्रशासन को मजबूत बनाने के लिए किया। सामन्तवादी प्रथा के विपरीत इल्तुतमिश ने समय-समय पर इक्तादारों का स्थानान्तरण करके उन्हें केन्द्रीय प्रशासन के नियन्त्रण में रखने का सफल प्रयास किया। इसके अतिरिक्त जिन राजपूत शासकों ने दिल्ली सल्तनत की अधीनता स्वीकार कर ली थी, उन्हें भी नजराना देने के बदले में उनके राज्य लीय दिए गए ।
 
इल्तुतमिश ने अरबी प्रथा के आधार पर एक नई मुद्रा प्रणाली भारत में लागू की । इसमें ताँबे के सिक्कों अथवा जीतल और चाँदी के सिक्कों अथवा टंकों को प्रचलित किया गया। इन सिक्कों पर इल्तुतमिश का नाम अरबी लिपि में अंकित था। इन नए सिक्कों का प्रचलन भारत में तुर्की की सत्ता की सुदृढ़ता का प्रतीक था ।
 
इल्तुतमिश के अधीन एक केन्द्रीय सेना का प्रमाण नहीं मिलता। उसने शाही अंगरक्षकों अथवा जानदारों का एक दल बनाया था जो युद्ध के समय शाही सेना के रूप में भी काम करता। या । इस व्यवस्था से वह सैनिक शक्ति के मामले में इक्तादारों के ऊपर पूरी तरह निर्भर रहने से मुक्त हो गया। आगे चलकर बलबन ने इसी आधारशिला पर सैन्य-संगठन का निर्माण किया ।


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